ब्रेस्टफीड कराने वाली महिलाओं की संख्या में हुई बढ़ोतरी

हाल ही में गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री और मध्य प्रदेश की गर्वनर आंनदीबेन पटेल ने कहा कि शहरों में महिलाओं को लगता है कि ब्रेस्टफीडिंग कराने से उनका फिगर खराब हो जाएगा। मगर आंकड़े तो इसके उलट हैं। बीते साल में ब्रेस्ट फीडिंग और नर्सिंग मदर की संख्या में वृद्धि हुई है। इसका असर इंफेन्ट मॉर्टेलिटी रेट पर भी पड़ा है। 1992-93 में जो दर 78.5 फीसदी थी, वह 10 साल में 2005-06 तक 21 फीसदी घटकर 57 फीसदी हो गई है। आंकड़े किसी भी हाल में आंनदीबेन के बयान से मेल नहीं खाते। हमने पड़ताल करने की पहल की है कि क्या वाकई शहरी महिलाएं अपने फिगर को बचाए रखने के लिए स्तनपान से बचती हैं।

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मैडम को ब्रेस्ट फीडिंग से परहेज नहीं
आंकड़ों पर गौर फरमाया जाए, तो ब्रेस्टफीडिंग को लेकर एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। इससे साफ पता चलता है कि शहरी औरतें अतीत की तुलना में आज ब्रेस्टफीडिंग को लेकर जागरूक हुई हैं और ब्रेस्टफीडिंग में वृद्धि हुई है। इससे इंफेन्ट मॉर्टेलिटी रेट (शिशु मृत्यु दर) में भारी कमी आई है। आज से तकरीबन 25 साल पहले शिशु मृत्यु दर 78.5 फीसदी थी, जबकि 2005-06 तक 21 फीसदी घटकर 57 फीसदी रह गई। दिलचस्प बात यह है कि इंडिया स्पेंड में दिए आंकड़ों और नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 (NFHS) के मुताबिक ये आंकड़ा 2015-2016 में 41 फीसदी था। इसी रिपोर्ट के मुताबिक शुरुआती ब्रेस्टफीडिंग मामले में भी 32.1 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यहां NFHS-4 के और भी ताजातरीन डाटा भी कुछ और ही तथ्य बयान करते हैं। अर्बन इलाकों में 42.8 फीसदी बच्चों को हर आधे घंटे में ब्रेस्टफीड कराया जाता है, वहीं ग्रामीण इलाकों में 41 फीसदी बच्चों को स्तनपान कराया जाता है। शहरी इलाकों में 6 महीने से कम उम्र के बच्चों को 52.1 फीसदी विशेष रूप से ब्रेस्टफीड कराया जाता है। वहीं ग्रामीण इलाकों में 56 फीसदी ब्रेस्टफीड कराया जाता है।

फिगर खराब नहीं सही होता है
जानी-मानी न्यूट्रिशनिस्ट डॉक्टर नुपूर कृष्णनन के अनुसार, ‘स्तनपान से औरतों का फिगर खराब नहीं होता, बल्कि सही होता है। यह एक मिथ है कि दूध पिलाने से मां का फिगर शेप में नहीं रहता। लेक्टेशन के दौरान मां की खाने-पीने की रिक्वायरमेंट बदल जाती है। उसके खान-पान में वृद्धि होती है और दूध पिलाने से वह खाना-पीना दूध बनाने के काम में आता है। कैलरीज बर्न होती हैं। ब्रेस्ट फीडिंग से मां के हार्मोंस बैलेंस होते हैं। मेटाबॉलिज्म सिस्टम रेगुलराइज होता है और यूटरस अपनी जगह पर आता है अर्थात यूटरस कॉन्ट्रैक्शन होता है। जो औरतें स्तनपान नहीं करवा पातीं, कई बार उनके यूटरस के बाहर आने की संभावना बढ़ जाती है। मैंने खुद अपने बच्चे को साढ़े तीन साल तक स्तनपान करवाया है। मुझे लगता है स्तनपान बच्चे को खिलाने-पिलाने की ही बात नहीं होती, बल्कि उससे उसके और मां के बीच एक इमोशनल बॉन्डिंग होती है, जो शिशु और मां के रिश्ते को और मजबूत बनाती है।’

डेढ़ साल के बेटे को कराती हूं ब्रेस्ट फीडिंग: मिताली नाग
अफसर बिटिया की अभिनेत्री मिताली नाग इन दिनों छोटे परदे पर सीरियल रूप मर्द का नया स्वरूप में नजर आ रही हैं। वह डेढ़ साल के बेटे की मां हैं। मिताली कहती हैं, ‘मुझे लगता है कि आनंदीबेन ने ऐसा बयान देकर सभी औरतों को जर्नलाइज कर दिया है। मैं ग्लैमर और अभिनय की जिस इंडस्ट्री से ताल्लुक रखती हूं,वहां पेशे की डिमांड को देखते हुए ऐसा हो सकता है। मगर जहां तक मेरी अपनी बात है, तो मेरा बेटा डेढ़ साल का हो गया है और मैं अभी तक उसे ब्रेस्टफीड कराती हूं। मैंने पहले दिन से उसे स्तनपान करवाया। मैं अपने बेटे के लिए मां के दूध की अहमियत जानती हूं।

मैंने खुद साढ़े तीन-चार साल तक अपनी मां का दूध पिया है और आज भी मेरा इम्यून सिस्टम इतना मजबूत है कि मैं आसानी से बीमार नहीं पड़ती। मुझे लगता है कि एक बच्चे को अपना दूध पिलाना चाहिए, इसकी फिक्र एक मां से ज्यादा और किसे हो सकती है? लोगों को यह समझने की जरूरत है कि कई बार कामकाजी औरतें चाहते हुए भी अपने बच्चे को दूध नहीं पिला पातीं, क्योंकि उनके पास साधन और सुविधा नहीं होती। मैं अपने बच्चे को अपने साथ शूटिंग पर ले जाती हूं। शुरुआती दौर में मैं जब ऑडिशन पर जाती, तो पंप का इस्तेमाल करके दूध निकालकर घर पर रखकर जाती थी।