जस्टिस लोया के बेटे का बयान- हमें किसी पर शक नहीं, मौत पर ना हो राजनीति

 नई दिल्ली ।  सीबीआइ के विशेष जज बीएच लोया की हार्टअटैक से हुई जिस मौत को लेकर सवाल उठ रहे हैं उसे लेकर दिवंगत जज लोया का परिवार भी काफी दुखी है। पहली बार मीडिया के सामने आते हुए लोया परिवार ने अपनी राय रखी। जस्टिस लोया के बेटे अनुज ने मीडिया से बात करते हुए कहा, ‘पिता की मौत के समय मैं सिर्फ 17 साल का था, इसलिए मुझे इस बारे में ज्यादा नहीं पता है। कई लोग इस मामले में परिवार को परेशान कर रहे हैं। हमें किसी पर शक नहीं है।  हमें इस विवाद की वजह से काफी दिक्कत हो रही है।’

लोया परिवार ने यह भी कहा कि कई एनजीओ और वकील उनके परिवार को परेशान कर रहे हैं और यह बंद होना चाहिए। इस मुद्दे को किसी विवाद में ना घसीटे। परिवार ने कहा कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण ना करें और हमें जस्टिस लोया की मौत की जांच की जरूरत नहीं है।

2014 को हार्ट अटैक से हुई थी जस्टिस लोया की मौत

मुंबई की स्थानीय अदालत में सीबीआइ के विशेष जज लोया की मौत 31 नवंबर और एक दिसंबर 2014 की रात को हार्टअटैक से हुई थी, जहां वे एक सहयोगी जज की बेटी की शादी में शरीक होने गए थे। जाहिर है उनके साथ मुंबई के ही कई दूसरे जज भी थे। खास बात यह है कि हार्टअटैक की सूचना मिलते ही मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के दो न्यायाधीश तत्काल उन्हें देखने अस्पताल पहुंच गए थे और उनकी मौत के समय सात जज अस्पताल में मौजूद थे। हाईकोर्ट के जजों की देख-रेख में ही उनका पोस्टमार्टम हुआ और शव को उनके पैतृक गांव भेजा गया। जाहिर है उनकी मौत पर किसी को आशंका नहीं हुई और किसी ने उसकी जांच की मांग भी नहीं की।

एक पत्रिका ने लगाया था मौत के पीछे साजिश का आरोप

तीन साल बाद गुजरात चुनाव के ठीक पहले एक पत्रिका ने जज लोया की मौत के पीछे बड़ी साजिश का आरोप लगाते हुए खबर छापी। इसमें भी जज लोया के बेटे और पत्नी की ओर से कुछ नहीं कहा गया था। बल्कि उनकी बहन और पिता के हवाले से मौत के पीछे साजिश और उसकी जांच की मांग उठाई गई थी। जाहिर है गुजरात चुनाव के पहले छपी इस खबर को आधार बनाकर कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने भाजपा पर हमला बोल दिया। लेकिन एक हफ्ते के भीतर ही एक राष्ट्रीय अखबार ने जज लोया की मौत के समय मौजूद हाईकोर्ट के दो मौजूदा जजों, जांच व पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों व अन्य चश्मदीद गवाहों से बातचीत कर रिपोर्ट छापी, जिसमें पत्रिका में लगे आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया गया। लेकिन इस बीच बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में इसकी उच्च स्तरीय जांच की मांग वाली याचिका भी दाखिल कर दी गई। याचिका कांग्रेस के ही सदस्य तहसीन पूनावाला की ओर से था।

 सोहराबुद्दीन केस की सुनवाई सिर्फ पांच महीने की थी सुनवाई

मजेदार बात यह है कि जज लोया ने सोहराबुद्दीन केस की सुनवाई सिर्फ पांच महीने तक की थी। 2012 से 2014 तक इस केस की सुनवाई जज जेटी उत्पत कर रहे थे, 25 जून 2015 को जिनका तबादला हो गया था। इसके बाद जज लोया को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई।

जज लोया की मौत की सच्चाई चाहे जो हो लेकिन विपक्ष सोहराबुद्दीन मुठभेड़ कांड को लेकर आठ सालों से सीधे तौर पर अमित शाह और परोक्ष रूप से मोदी पर निशाना साधता रहा है। 2013 के गुजरात विधानसभा चुनाव के और 2014 के आम चुनाव के पहले सोहराबुद्दीन मुठभेड़ विपक्ष के लिए बड़ा मुद्दा था।